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हज़रत दीवाना शाह

इब्तदाई ज़िन्दगी

हिन्दुस्तान के सुबाए गुजरात में डीसा छावनी पालनपुर के करीब एक शहर वाकेअ है। शहर डीसा के महल्ला कुरैशीयान में हजरत अब्दुल कादिर अलयहिर्रहमा कयाम पज़ीर थे। आपकी शरीके हयात का नाम जे़नब बी अलयहा-रहमा था। महल्ला कुरैशीयान में आप मुमताज हैसीयत के मालिक होकर तिजारत किया करते थे।

अल्लाह तआला के फज़लों करम से गालिबन 25 मोहरर्म 1292 हिजरी, 4 मार्च 1875 बरोज जुमेरात को आप के घर में एक चश्मो चिराग पैदा हुआ। जिसका नामे नामी इस्में गिरामी अब्दुर्रज़्ज़ाक रखा गया। बिला शुबहा अब्दुर्रज़्ज़ाक घर के लिए नेअमत बनकर तशरीफ लाए। आपका घर अनवारो तजल्लीयात से मुनव्वर हो गया। आपके एक भाई और एक बहन थी। आपके वालिदे मोहतरम ने बड़े ही नाज़ो अदा से परवरिश फरमाई। बाबा हुजूर की भोली भाली सूरत को देखने वाला देखता ही रह जाता था। ज़माना उस भोली भाली सूरत को प्यार से “कालू” कहकर पुकारने लगा। आपकी उम्र तकरीबन 5 साल की हुई तो हस्बे दस्तूर फरमाने मुस्तफा के तहत वालदैन ने आपका मदरसा में दाखिला कराया। आप बड़े ही ज़हीन फिक्री दिमाग और नाबेगा ज़हन के मालिक थे। आपने कुरआनों हदीस की तालीम हासिल की। इसके साथ ही हिन्दी, गुजराती, उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी जुबान की भी तालीम हासिल फरमाई। ज़्यो-ज़्यो वक्त गुज़रता गया। आपकी ज़िन्दगी परवान चढ़ने लगी। ज़ाहिरी तालीम से फारिग़ होने के बाद वालिदे मोहतरम के हुक्म पर कारोबार में मसरूफ हो गए। खानदानी तर्ज़ पर आप जंगल में बकरियां चराने की खिदमत अंजाम देने लगे। जो ज़माने के लिहाज से आम बात थी। लेकिन यह अल्लाह का वली अपनी ज़िन्दगी का आगाज़ सुन्नते रसूल से कर रहा था। रब तबारक तआला ने आपके मुकद्दर में लोहे महफूज़ पर कुछ और ही तहरीर फरमा रखा था। जिससे ज़माना नावाकिफ था। बाबा हुजूर के कदम रफ़्ता-रफ़्ता मंज़िले मकसूद की तरफ बढ़ने लगे। इसी धुन में आप तन्हाई पसंद फरमाने लगे। दुनियावी लहवो लईब से दर किनार रहने लगे और रमुजे हक पर गौरो फिक्र फरमाते रहते। इस बुनियाद पर खानदानी रिश्तों में दिलचस्पी नहीं रहती और दुनियावी माहौल से बेज़ार रहने लगे। आपकी यह हालत देखकर आपके वालिदे मोहतरम ने घर वालों से मशविरा कर आपके लिए बेहतर रिश्ता तलाश किया और देखते ही देखते आपको शादी के बंधन में बांध दिया और हज़रते मरीयम से आपकी निकाह हुआ।

यह भी ज़माने के लिए एक आम बात थी। मगर बाबा हुजूर का यह दूसरा अमल भी सुन्नते रसूल पर गामज़न था। लेकिन यह शादी का बंधन भी आपकी तन्हाई को न तोड़ सका। आप दुनियावी फर्ज भी निभाते और रमूजे हक की फ़िक्र में रहते। यहाँ तक के अल्लाह तआला ने आपको औलाद की नेअमते ला ज़वाल से नवाज़ दिया। रब के फज़्ल से आपके दो साहबजादे पैदा हुए। एक का बचपन ही इंतकाल हो गया और दूसरे साहबज़ादे का नामे नामी इस्म गिरामी मोहम्मद हुसैन रखा। बाबा हुजूर अपने कारोबार में मसरूफ रहकर दीनी व दुनियावी फराईज बखूबी अंजामी फरमा रहे थे। मगर आपका दिल रमूजे हक की तलाश में बेताब रहता। जब बेताबी हद से ज्यादा बढ़ी तो आपका दिल बेकरार हो उठा। बेकरारी के आलम में एक मोहब्बत भरी निगाह अपनी शरीके हयात और अपने साहबज़ादे पर डाली तो आपकी नज़रे ठहर गई। इसी पशोपेश के आलम में दिल ने रहनुमाई करते हुए आवाज दी।

“अब्दुर्रज़्ज़ाक ठहरों नहीं, तुम्हारी मंजिल अभी बहुत दूर है, तुम्हे उसे हासिल करना है। बिस्मिल्लाह करों रहमते इलाही तुम्हारे साथ है।”

आपने फौरन फैसला फरमाया और रात की तारीकी मेें जहाँ चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। शहर के बाशिन्दे मीठी नींद की आगोश में सो रहे थे और आप अपने अहलो अयाल व अहबाबो अकरबा को अल्लाह के भरोसे छोड़कर अपने आबाई वतन को खैराबाद कहकर तलाशे हक के सफर के लिए रवाना हो गए।

रूकना नहीं अर्शी फर्श की आवाज़ से। आपको जाना है दूर हद्दे परवाज़ से।।