Miracles

करामात-1

बाबा हुजूर एक मरतबा दौराने सफर थे। आपके हुजराए शरीफा में चोरी की नियत से एक शख्स दाखिल हो गया और हुजरे में तलाशी लेना शुरू की। हस्बे नियत कोई चीज़ दस्तयाब न हो सकी। वो गुस्से में आ गया सोचने लगा आपके यहां तो कुछ नज़र नहीं आ रहा है। आनन-फानन में किताबों पर नज़र पड़ी। सभी किताबों को उठाया, कपड़े में बाँधा और कलाल के कुएँ में डाल दिया। बाबा हुजूर ने सफर से अहमद मुल्ला को खबर भिजवाई कि मेरे हुजरे में चोरी हो गई है उसका पता लगाओ। अहमद मुल्ला ने कपासन के थानेदान को भी इत्तला दी और आम चर्चा फैल गई। लेकिन न चोर का पता लगा न चोरी किए हुए माल का पता चला। कुछ दिन गुज़रने के बाद बाबा हुजूर कपासन तशरीफ लाए, तब अहमद मुल्ला ने सब हाल हकीकत सुनाई। सुनते ही आप को जलाल आ गया। आलमे जलाल में आपने फरमाया। ”फलाँ शख्स को हाजिर करो“ फौरन उस शख्स को आपकी बारगाह में हाजिर किया गया, उसके आते ही आपने पुर जलाल लहज़े में इरशाद फरमाया ”मेरी किताबें कहाँ है ? तुम बताते हो या मैं बताऊं“ आपकी आवाज़ में वोह असर था कि वोह आपके कदमों में गिर गया। अर्ज़ किया हुजूर मुझे माफ कर दो, आइन्दा ऐसी हरकत नहीं करूंगा। किताबें तो मैंने कलाल के कुएँ में डाल दी है जो पानी से भरा हुआ है, हुजूर अब कैसे लाऊँ। तब आपने मुल्ला अहमद को हुक्म फरमाया, इसके साथ जाओ और मेरी किताबें निकाल कर लाओ। हुक्म पाते ही मुल्ला अहमद उस शख्स के साथ कुएँ पर पहुंचे और लोहे का आला (बलाई) कुएँ में डाला तो कोई चीज़ उसमें फंस गई। वज़न महसूस हुआ उसे खींचकर बाहर निकाला तो क्यो देखते है ? कपड़े के बण्डल में तमाम किताबें बंधी हुई है, उसको खोलकर जब देखा तो किताबों में पानी का असर न था और एकदम सुखी किताबें निकली, जो बाबा हुजूर की खिदमत में पेश कर दी गई। तब बाबा हुजूर मुस्कराए और आइंदा चोरी नहीं करने की हिदायत देते हुए शख्स को माफ फरमा दिया।

करामात-2

बाबा हुजूर की सोहबत में कई लोग अपना फर्ज़ समझकर मजलिस में हाजिर रहा करते थे और हस्बे नियत फैज़याब होते रहते। एक मरतबा बाबा हुजूर से कासम मंगलिया ने अर्ज़ किया! हुजूर हमें भी अमल बख्शीए। बाबा हुजूर मौज में आ गए, आलमें मौज में आकर इरशाद फरमाया। ये आयत याद कर चालीस रोज़ तक बाद नमाज़ ईशा इस आयत का विर्द इस ढंग से करो। जब तुम मंज़िल पर पहुँच जाओ तो फलां फलां चीज़ को मिलाकर यह आयत पढ़कर दम कर देना। इन्शा अल्लाह वोह चीज़ चांदी बन जाएगी। आलमे मोज का फरमान था और उस शख्स ने इस वज़ीफे को शुरू कर दिया। चालीस रोज़ बाद उन तमाम चीज़ों को इकट्ठा कर उस आयत को पढ़कर दम किया तो वोह चीज़ हकीकत में चांदी बन गई। उसे बाज़ार में बेचकर रुपये हासिल कर लिए। वह शख्स आराम से खाने पीने लगा और जब जब जरूरत होती तो इस तरह चांदी बनाकर बाज़ार में बेचकर रुपये हासिल कर लेता। धीरे-धीरे वोह शख्स बाबा हुजूर की सोहबत से दूर रहने लगा। क्योंकि उसका मतलब हल हो चुका था। एक रोज़ बाबा हुजूर का गुज़र उसके मकान की जानिब से हुआ तो क्या देखा ? उसके आंगन में मुर्गे-मुर्गियां काजू बादाम खा रही है। बाबा हुजूर ने कदम ठहर गए। आवाज़ दी कासम यह मुर्गे-मुर्गियाँ क्या खा रही है ? कासम ने जवाब दिया - बाबा हुजूर ये काजू बादाम खा रही है। इस पर आपने फरमाया, ये गिज़ा अल्लाह तआला ने इंसानों के लिए बनाई है तुम जानवरों को खिला रहे हो ? इस पर जवाब मिला हुुजूर पैसो की कोई कमी नहीं है। अगर ये काजू बादाम खायेंगे तो इनका गोश्त लज़ीज़़ होगा। इस पर बाबा हुजूर ने इज़़हारे अफसोस फरमाया और इरशाद फरमाया ”अच्छा ठीक है“ और आप हुजरे में आकर आराम फरमाने लगे। इसके बाद उस शख्स ने चांदी बनाना चाहा मगर चांदी नहीं बन सकी, हर चंद कोशिश करके देख ली। दौड़ा-दौड़ा बाबा हुजूर की बारगाह में हाजिर हुआ, और अर्ज किया हुजूर चांदी नहीं बन रही है। बाबा हुजूर ने फरमाया तुम अमल भूल गए होंगे। उस शख्स ने जवाब दिया हुजूर मुझे याद है और पढ़कर सुना दिया। तब आपने फरमाया ”ये अल्लाह की मर्ज़ी है इसमें मैं क्या कर सकता हूँ।“ वो शख्स आपके कदमों में गिरकर खूब गिड़गिड़ाया, मगर आपने तवज्जो न फरमाई। उसके बाद वोह शख्स अपनी ज़िन्दगी में कभी चांदी नहीं बना सका।

करामात-3

एक मरतबा बाबा हुजूर की बारगाह में महल्ला मोमिनान का एक शख्स हाज़िरे खिदमत हुआ। अर्ज़ किया मुझे बीस रुपये की सख्त जरूरत है। आप मेरा यह काम निकालने की महरबानी फरमाऐं। आपने फरमाया हम फकीर दुर्वेश लोग है। हमारे पास पैसा कहाँ है ? हम कहाँ से लाए ? खूब टालने की कोशिश की लेकिन वोह भोला-भाला गरीब मचल गया। आजिज़ आकर आपने फरमाया अच्छा ठीक है। चार बजे आ जाना। वक्त मुकर्ररा पर वोह शख्स आपकी बारगाह में हाज़िर हो गया। मजलिस जमी हुई थी। वोेह शख्स भी मजलिस में आकर बैठ गया। इतने मैं एक शख्स आपकी बारगाह में हाज़िर हुआ, सलाम पेश कर अर्ज किया। हुजूर में भीलवाड़ा से हाज़िर हुआ हूँ और भीलवाड़ा वालों ने आपकी खिदमत में सलाम पेश किया है और ये तोहफा भेजा है। तोहफा क्या था ? एक कागज़ में लिपटा हुआ बण्डल। इस पर बाबा हुजूर ने कहा यह फलां शख्स को दे दो। उस गरीब ने उस बण्डल को अपने पास रख लिया और बैठा रहा। जब मजलिस का वक्त खत्म हुआ। लोग उठ उठकर जाने लगे। तब आखिर में उस शख्स ने अर्ज़ किया। हुजूर मैं चार बजे से बैठा हुआ हूँ। अब तो मेरा काम कर दीजिए। आपने मुस्कराकर फरमाया नादान तेरा काम कर तो दिया है। उस शख्स ने बड़े ही भोलेपन से जवाब दिया। हुजूर इस बण्डल का मैं क्या करूँ ? मुझे तो बीस रुपये चाहिए। तब बाबा हुजूर ने फरमाया इसे खोलकर तो देख ? हुक्म पाते ही जब वह बण्डल को खोलता है तो क्या देखता है कि उसमें बीस रुपये ही थे। वोह खुश होता हुआ अपने घल चला गया। कुछ दिनों बाद बाबा हुजूर ने उससे तकाज़ा किया। आजिज़ आकर उस शख्स ने पाँच रुपये तो अदा कर दिए। मगर बाकी रकम बार-बार तकाज़ा करने पर भी उसने अदा नहीं की। इस दौरान बाबा हुजूर का विसाल हो गया। अब कोई तकाज़ा करने वाला नहीं था। कई सालों बाद जब बुलंद दरवाजें की तामीर हो रही थी, बाबा हुजूर ने ख्वाब में आकर उसका तकाज़ा फरमाया। मेरे पन्द्रह रुपये अदा करो। उस शख्स ने इसे ख्वाब समझकर तव्वजो न दी। दूसरे दिन फिर ख्वाब आया। इसके बावजूद भी उस शख्स ने कोई तव्वजो न दी। तीसरे रोज़ फिर ख्वाब आया। आपके चेहरे पर गुस्सा और हाथ में असा था। आपने फरमाया सुनता नहीं मेरे रुपये क्यों नहीं देता ? मुझे बुलंद दरवाजे़ की तामीर में जरुरत है। मैं तुझे आखरी बार चेतावनी दे रहा हूँ। मेरे रुपये अदा कर देना वरना ठीक नहीं होगा। इस आवाज़ में वो जलाल था कि बदन थर्रा गया। दूसरे दिन वो शख्स बाबा हुजूर के दरबार में हाज़िर हुआ और मास्टर हरीराम जी को पन्द्रह रुपये देते हुए कहा। ज़िन्दा तो तकाज़ा हर कोई करता है, मगर बाबा हुजूर तो पर्दा फरमाने के बाद भी तकाज़े पर तकाज़ा कर रहे है। तब मास्टर हरीराम जी को हाजेरीन के सामने पूरा वाकेआ बयान किया।

तू ज़िन्दा है वल्लाह तू ज़िन्दा है वल्लाह!

मेरे चश्मे आलम से छुप जाने वाले।।


करामात-4

बाबा हुजूर की ज़ात बहुत निराली है। बड़ी से बड़ी बात को आसान लफ्जों में समझाना आपकी आदते करीमाना थी। आपके मुरीद अमीन बाकर बहुत अज़ीज़ थे। वोह भी आपसे बेपनाह मोहब्बत रखते। इसके जवाब में बाबा हुजूर कही ज्यादा शफकत फरमाते। हद तो उस वक्त हो गई जब बाबा हुजूर मोहब्बत के आलम में अमीन बाकर अली को तहरीर फरमाते है। ”अमीन बाकर अली तुम एक रात के लिए मुझसे आकर मिल जाओ। मुझे तुम्हारी याद आ रही है“ बाबा हुजूर का जब भी चित्तौड़ से गुज़र होता तो अमीन बाकर अली अपने तमाम दुनियावी मसरूफियात से आज़ाद होकर आपसे मुलाकात के लिए स्टेशन पहुंच जाते। आप जहाँ भी रहते बाबा हुजूर को बुलाकर मेहमान नवाज़ी कर खुश होते। आपकी आमद पर यह ख्याल फरमाते कि आज मेरे घर पर दीनों दुनिया की दौलत आ गई है और बाबा हुजूर भी उन्हें हर वक्त नवाज़ते रहते थे। एक मरतबा बाबा हुजूर चित्तौड़ अमीन बाकर अली के घर तशरीफ ले गए। जब तक आपकी तबीयत रही आपने वहीं कयाम फरमाया। एक दिन आपने फरमाया। अमीन जी अब हम कपासन जायेंगे, सवारी का इंतजाम करो। अमीन जी ने फौरन दरवाजे़ पर ताँगा बुलवाया और रूखसत करने के लिए तांगे पर सवार हो गए। तांगा अपनी रफ्तार से स्टेशन की ओर जा रहा था। बाबा हुजूर और अमीन जी बातों में मसरूफ थे। इतने में लोगों ने शोर मचाया और तांगा रोकने का इशारा किया। तांगा इतनी तेज रफ्तार से था कि रूकते रूकते वक्त लग गया। तांगा रूकने पर जब दोनों हज़रात नीचे उतरे तो क्यो देखा कि तांगे का एक पहिया निकल चुका है और एक ही पहिये से तांगा चल रहा था। इतने में लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया। अमीन बाकर अली आपकी नूरानी सूरत को निहारते रह गए। जब बाबा हुजूर ने फरमाया। अमीन जी आज खुदा ने अपने फज्ल से हमें बचा लिया, तुम्हारा भारी भरकम जिस्म आज काम आ गया। तुम्हारे वज़न से तांगे का बेलेन्स बना रहा। अमीन बाकर अली ने अर्ज किया। हुजूर ये मेरे बदन का कमाल नहीं बल्कि आपकी शाने करामत है और ज़माना पुकार उठा।

एक ही पहिया से तांगा चला है।

तेरा है ये अख्तियार दीवाना पिया।।


करामात-5

बाबा हुजूर अल्लाह के महबूबतरीन बंदे है और मनसबे विलायत पर फाईज़ है। वली दुनियां से पर्दा फरमाने के बाद भी ज़िन्दाएं जावेद होते है और आपका फै़जान आम होता है। जिसका मंज़र शंहशाहे मेवाड़ के दरबार में रातों-दिन देखा जा सकता है। जहां आफात के मारे दीन दुखियारे और लाईलाज मरीजों का जमघट लगा रहा है। बाबा हुजूर हस्बे मंशा फैज़ अता फरमाते है। ये सिर्फ दावा ही नहीं बल्कि दलील भी पेश है। उदयपुर आयड़ बाशिन्दा अब्दुर्रज़्ज़ाक वल्द हाजी हबीबुर्रहमान छीपा इसकी जीती जागती मिसाल है। इनकी आँख बाहर निकली हुई थी। जिसकी बिना पर डरावनी सूरत हो गई। इसका इलाज उदयपुर, जयपुर, बम्बई, अहमदाबाद, बैंगलौर कराया मगर आराम नहीं हुआ। डाॅक्टरों ने मशविरा दिया इसके आॅपरेशन के लिए विदेश से डाॅक्टर बुलवाना होगा और फिर भी कोई गारंटी नहीं कि आँख ठीक हो जाए। आॅपरेशन से दिमागी तवाजुन बिगड़ सकता है या ज़िन्दगी से हाथ धोना पड़ सकता है। तब मजबूर होकर शहंशाहे हिन्द ख्वाजा गरीब नवाज़ की बारगाह में हाज़री देकर शहंशाहे मेवाड़ के दरबार में हाज़िर हुआ और अहद कर लिया ”आपका दर छोड़कर मैं उस वक्त तक नहीं जाऊँगा तब तक मेरी आँख ठीक नहीं हो जाएगी, चाहे मुझे मौत ही क्यों न आ जाए। जीना है तो आपकी चैखट पर और मरना है तो आपकी चैखट पर“ इसी इरादे से शबो रोज गुजारने लगा। औलिया मस्जिद में बाजमाअत पंजवक्ता नमाज अदा करना और बारगाहे शहंशाहे मेवाड़ में दरख्वास्त पेश करना मेरा मशगला बन गया। आखिर बाबा हुजूर ने करम फरमा ही दिया। एक दिन फरवरी सन् 1979 में बाद नमाज ईशा दरबार में खड़ा हुआ दुआं मांग रहा था। आँख से आँसू जारी हो रहे थे। अर्ज किया - हुजूर करम फरमा दीजिए, मैं आपका दर छोड़कर जाने वाली नहीं हूँ और जब फातेहा खत्म हुई और मैंने अपना हाथ चेहरे पर फेरा तो मुझे एहसास हुआ कि कोई गैबी हाथ अपने चेहरे पर आ रहा है और ज्यों ही मेरा हाथ आँख के करीब पहुँचा खट से आवाज आई और मेरी आँख बैठ गई। लोगों ने जब चेहरे को देखा मुताअज्ज़ीब होकर मुझे मुबारकबाद दी। कहा दीवाना पिया का करम हो गया और आज भी मेरी आँख असली हालत में अपनी जगह पर मौजूद है।

न हो आराम जिस बीमार को सारे ज़माने से।

उठा ले जाए थोड़ी खाक इनके आस्ताने से।।


करामात-6

बाबा हुजूर के यहाँ हर मज़हबो मिल्लत और आमो खास लोग मुलाकात के लिये हाजिर हुवा करते थे। इसी सिलसिले में बनेड़ा दरबार के मुलाज़िम हमीद खाँ साहब हाज़िर हुवे। बाबा हुजूर की खिदमत में काफी देर रहने के बाद बनेड़ा जाने की इज़ाजत चाही। तब बाबा हुजूर ने जाने से मना फरमाया। जब हमीद खाँ ने बार-बार असरार किया तो बाबा हुजूर ने फरमाया हमीद खाँ आज तुम बनेड़ा नहीं जा पाओगे क्योंकि तुम्हारे रास्ते की नदी में पानी बहुत बह रहा हैं। तब हमीद खाँ ने अर्ज किया! हुजूर कहीं भी बादल नजर नहीं आ रहे हैं और अभी बारिश का वक्त नहीं है। तब बाबा हुजूर ने फरमाया बारिश का मौसम नहीं है मगर नदी में पानी पूरी आबो ताब से बह रहा है और तुम अगर सबूत देखना चाहते हो तो देख लो। आपने अपना हाथ जमीन पर मारा और हाथ को ऊपर उठाया और फरमाया यह लो उसी नदी की मछली और हमीद खाँ क्या देखते है कि बाबा हुजूर के हाथ में मछली है और पूरा हाथ पानी से तरबतर हैं और हाथ पर रेत भी लगी हुई है। और पानी की बूंदे नीचे गिर रही है। हमीद खाँ ने जब यह माजरा देखा तो बाबा हुजूर के कदम थाम लिये और वहीं और जब हमीद खाँ उस नदी के यहां पहुंचे तो लोगों ने बताया कि कल नदी का पानी तो नदी के किनारों से भी ऊपर बह रहा था और पानी अब कम हुआ है। हमीद खाँ के दिल में ख्याल आया - न बारिश है ना बारिश का मौसम है कुदरत का अजीब करिश्मा है और हकीकत है अल्लाह के वली रोशन ज़मीर होते हैं।।

जरा संभलकर फकीरो से तबसरा करना।
ये लोग पानी भी सुखी नदी से लेते हैं।।